स्वार्थ से स्वार्थ तक
उस रास्ते से यूं तो रोज़ ही गुज़रता था मैं
मोड़ पर दवाखाना था, दवाखाने में नरगिस़
मैं जो रोज़ अपने काम को निकलता तो शाम तक कई घाव पनप जाते थे, वार नहीं थे इरादे थे |
नरगिस़ नई नहीं थी दवाखाने में पर उसके मलहम लगाने के तरीके से कुछ की जान भी गई थी |
एक रोज मोड़ से पहले ही भीड़ थी
दवाखाने से पहले आज महखाना था,
महखाना मधुबाला का |
मैं ज्यों त्यों अनदेखा कर आगे बढ़ा दवाखाना 30 कदम और दूर था ,
मन में था सच्चे काफि़र मुड़ा नहीं करते |
अगली रोज फिर मै सिसकता उसी रास्ते जा रहा था,
पर कुछ जल्दी पहुंच गया |
उस रोज़़ कोई मोड़ नहीं था,
था तो महखाना, महखाना मधुबाला का ||
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